झाँसी: संवेदनाओं का संगम: बेटी की विदाई में सेवा का स्पर्श, साहित्यकार का सम्मान l

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@आकाश कुलश्रेष्ठ,

झाँसी की पावन धरती एक बार फिर संवेदना, संस्कार और सेवा के अद्भुत संगम की साक्षी बनी, जब नंदनपुरा निवासी राधा रायकवार के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन सामाजिक सहयोग और आत्मीयता के रंगों से सराबोर हो उठा। पिता स्वर्गीय परशुराम रायकवार की स्मृतियों और माता रेखा रायकवार के स्नेहिल आशीर्वाद के बीच, 21 अप्रैल को होने वाली राधा की शादी से पूर्व संघर्ष सेवा समिति कार्यालय में एक भावपूर्ण विदाई एवं उपहार समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर समिति के अध्यक्ष डॉ. संदीप सरावगी ने अपनी करुणा और संवेदनशीलता का परिचय देते हुए वैवाहिक जीवन में बंधने जा रही वधू को फुल साइज ट्रॉली बैग, साड़ी, पर्स सहित अनेक उपयोगी उपहार भेंट किए। राधा को “कलर्स ब्यूटी सैलून” से सुसज्जित कराया गया, जिससे उसके नए जीवन की शुरुआत सौंदर्य और आत्मविश्वास के उजास से भर उठी। यह दृश्य केवल एक विदाई नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी का जीवंत उदाहरण बन गया।

   इसी गरिमामयी अवसर पर संघर्ष सेवा समिति का मंच कला और साहित्य के सम्मान का भी साक्षी बना, जब प्रसिद्ध हिंदी फिल्म निर्देशक एवं लेखक हेमंत शरण का सम्मान किया गया। लगभग दो दशकों से हिंदी सिनेमा में सक्रिय हेमंत शरण, जिनकी कृतियाँ “धूप छांव” और “मुक्ति बोध” जैसी संवेदनशील फिल्मों में समाज की आत्मा को स्वर देती हैं, वे स्वयं डॉ. संदीप सरावगी के सामाजिक कार्यों से प्रभावित होकर कार्यालय पहुंचे थे। उन्होंने विशेष रूप से कन्याओं की विदाई जैसे पुण्य कार्य को अत्यंत प्रेरणादायक बताते हुए डॉ. संदीप के प्रयासों की हृदय से सराहना की। उल्लेखनीय है कि उन्हें मराठी फिल्म “पंख” के लिए लेखक के रूप में सम्मान भी प्राप्त हो चुका है, जो उनके रचनात्मक व्यक्तित्व की व्यापकता को दर्शाता है।

 संयोग की मार्मिकता तब और बढ़ गई जब हेमंत शरण की उपस्थिति में ही एक कन्या की विदाई और उपहार भेंट का कार्यक्रम चल रहा था‌, मानो साहित्य और संवेदना, दोनों एक ही धारा में प्रवाहित हो रहे हों। इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह में विजय नगरिया, जितेंद्र बिलैया, जानकी, सीतुल, अभिषेक, ब्रजेश निगम, ऐश्वर्य सरावगी, संदीप नामदेव, राजू सेन, अनुज प्रताप सिंह, राकेश अहिरवार, सिद्धांत गुप्ता, शुभांशु वर्मा, रिया वर्मा, अंजली विश्वकर्मा, बसंत गुप्ता, सुशांत गुप्ता सभी ने इस पुण्य और प्रेरणादायक क्षण को आत्मसात किया।

 यह आयोजन केवल एक समाचार नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक समर्पण की एक जीवंत गाथा बन गया, जहाँ एक ओर बेटी की विदाई में आंसुओं की नमी थी, वहीं दूसरी ओर सेवा और सम्मान की उजली रोशनी भी थी।

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